बधिर लोगों में द्विभाषीवाद कैसे काम करता है?

दुनिया में सात हजार से अधिक भाषाओं और बोलियों के साथ, यह सामान्य है कि कई स्थानों पर द्विभाषीवाद आवश्यक है। लेकिन बधिर लोगों के बारे में क्या? क्या वे द्विभाषी रूप से संवाद करने में भी सक्षम हैं?

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मरियम-वेबस्टर डिक्शनरी द्विभाषीवाद को "दो भाषा बोलने की क्षमता" के रूप में परिभाषित करती है। द्विभाषीवाद पूरी दुनिया में मौजूद है। दुनिया में सात हजार से अधिक भाषाओं और बोलियों के साथ, यह सामान्य है कि लोग अन्य भाषाओं के संपर्क में आते हैं जिससे द्विभाषीवाद को प्रोत्साहन मिलता है। लेकिन बधिर लोगों के बारे में क्या? क्या वे द्विभाषी रूप से संवाद करने में भी सक्षम हैं?

इस प्रश्न का उत्तर "हां" है। द्विभाषी परदेशवासी हो सकते हैं जो नए देश की भाषा सीखते हैं या बच्चे जो द्विभाषी परिवार में बडे होते हैं। बधिर लोग अक्सर एक संकेत भाषा बोलते हैं, जिसे उनकी मातृभाषा के रूप में देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त, वे वह भाषा सीखते हैं जो देश में सबसे अधिक बोली जाती है, मुख्य रूप से लिखित, बल्कि मौखिक रूप में भी और लिप-रीडिंग से। 

८०,००० बधिर लोग जर्मनी के संघीय गणराज्य में रहते हैं। Deutscher Schwerhörigenbund (DSB) के अनुसार, जर्मनी में १६ मिलियन लोग सुनने में असमर्थ हैं। उनमें से १४०,००० लोगों में ७०% से अधिक की विकलांगता की डिग्री है और सांकेतिक भाषा दुभाषिया पर निर्भर है।

दृश्य भाषाएं

सांकेतिक भाषाएं, दृश्य भाषाएं हैं और वे बोली जाने वाली भाषाओं जैसी, राष्ट्रीय भाषाओं और क्षेत्रीय बोलियों में भिन्न हो सकती हैं। पचास और साठ के दशक में, यह पता चला कि अमेरिकी साइन लैंग्वेज (ASL) के पास उसका स्वयं का व्याकरण है और यह असल में सब कुछ कर सकती है जो बोली जाने वाली भाषा कर सकती है। जर्मन साइन लैंग्वेज (DGS) कानूनी रूप से  DGB द्वारा एक अलग भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त थी।

सांकेतिक भाषा के माध्यम से, बधिर बच्चों के पास एक मूल भाषा होती है जो वे स्वभाविक रूप से सीख सकते है जैसे अन्य बच्चे बोली जाने वाली भाषा सीख सकते हैं । सांकेतिक भाषा में माहिर होने के बाद, उनके पास भाषाई आधार है जो उन्हें बोली जाने वाली भाषा सीखने की इजाजत देता है।

द्विभाषी और द्विसांस्कृतिक स्थिति 

सत्तर के उत्तरार्ध में, वैज्ञानिकों ने पाया कि बधिर लोग द्विभाषी और द्विसांस्कृतिक स्थिति में रहते हैं। उदाहरण के लिए, जर्मन और अमेरिकी माता-पिता के साथ बड़े होने वाले बच्चे दोनों संस्कृतियों के तत्व प्रदान करते हैं। इन बच्चों को द्विसांस्कृतिक माना जाता है। 

बधिर बच्चों के लिए भी यही है। उन्हें दो भाषाओं और दो संस्कृतियों के साथ सामना करना पड़ता है: सांकेतिक भाषा और बधिर लोगों की संस्कृति और बोली जाने वाली भाषा और सुनाई देने वाले लोगों की संस्कृति। वे संभाषी के आधार पर उपयुक्त भाषा का चयन करते हैं: बधिर लोगों के लिए सांकेतिक भाषा और सुनाई देने वाले लोगों के लिए बहुमत भाषा।

भाषाई विकास के इस तरह के उदाहरण सुनाई देने वाले बच्चों के द्विभाषी विकास से तुलनीय हैं। सांकेतिक भाषा और बोली जाने वाली भाषा इन बच्चों के लिए दो अलग-अलग भाषाएं हैं और तदनुसार विभेदित हैं। 

Bilingualism and the cultural identity in deaf people” नामक शोध प्रबंध में, जेसिका वालेस इस निष्कर्ष पर पहुंची कि एक अलग भाषा के रूप में सांकेतिक भाषा को पहचानना एक अलग संस्कृति के रूप में बधिर लोगों के समुदाय को पहचानने के साथ जुड़ा हुआ है। इसलिए, बधिर लोग खुद को अपनी भाषा के साथ एक सांस्कृतिक अल्पसंख्यक मानते हैं। इस तरह दोनों, बधिर लोग और सुनाई देने वाले लोग, उनकी दो भाषाओं और संस्कृतियों से बेहतर व्यवहार कर सकते हैं।

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